* लोकतंत्र के महापर्व में वाक्-चलीसा * आखिर क्यों फ़ेंका जरनैल सिंह ने जूता ? * लोकतंत्र का महापर्व और "कुछ ख्वाहिश" * "कश्मीरी पंडित" होने का दर्द * राजनेताओं हो जाओ सावधान, जाग रहा हैं हिंदुस्तान * जागो! क्योंकि देश मौत की नींद सो रहा हैं। * आखिर यह तांडव कब तक? * पाकिस्तानियों में अमेरिकी नीति का खौफ * खामोशी से क्रिकेट को अलविदा कह गया दादा * कैसे निपटा जाए आतंकवाद से- 01 * कैसे निपटा जाए आतंकवाद से- 02 * कैसे निपटा जाए आतंकवाद से- 03 * कैसे निपटा जाए आतंकवाद से- 04 * क्या इसे आतंकवाद न माना जाये ? * कही कश्मीर नहीं बन जाये "असम" * जेहाद या आतंकवाद का फसाद * बेबस हिन्दुस्तान, जनता परेशान, बेखबर हुक्मरान * ‘आतंकवाद की नर्सरी’ बनता आजमगढ़ * आतंकवाद का नया रूप * आतंकवाद और राजनीति *
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Wednesday, December 3, 2008

राजनेताओं हो जाओ सावधान, जाग रहा हैं हिंदुस्तान

मुंबई हमले के विरोध में सारा देश उठ खड़ा हुआ हैं। हमले के विरोध में बुधवार को लोगों का जन सैलाब मुंबई में गेटवे ऑफ इंडिया के निकट इकट्ठा हुई। दिल्ली में भी जंतर-मंतर और इंडिया गेट पर मुंबई में हुए आतंकी हमले के विरोध में जन सैलाब उमर पड़ा। 59 घंटे की आतंक ने देश को दहशत और नफरत के जज़्बातों में गोते लगाने को मजबूर कर दिया हैं। जन सैलाब में पाकिस्तान के साथ-साथ राजनेताओं के खिलाफ़ जबर्दस्त गुस्सा देखने को मिला। देश में राजनेताओं के खिलाफ़ ऐसी नफ़रत कभी नहीं देखी गयी।

यह देश की जनता की स्वत:स्फूर्त भावना थी। यह आयोजन प्रायोजित नहीं था, एसएमएस, मेल, रेडियो स्टेशनों, टीवी चैनलों से लोगों को आतंकवाद के खिलाफ इस प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की गई थी। इस जनआंदोलन में सभी वर्ग के लोगों ने हिस्सा लिया। जिनमें छात्र, स्वयंसेवी संगठन के लोग, प्रोफ़ेसर, बुद्धिजीवी, उद्यमी और बॉलीवुड के सितारे भी शामिल थे। प्रदर्शनकारियों के हाथों में तिरंगा झंडा, तख़्तियाँ और बैनर थी। ज़्यादातर प्रदर्शनकारी का मानना था कि हमारे सॉफ्ट स्टेट की पॉलिसी और राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते ही कोई भी हमारे 'घर' में घुसकर हमें मारकर चला जाता हैं।

वहीं दूसरी तरफ़ मुंबई में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे आमजनों को मुंबई पुलिस ने बलपूर्वक भगा दिया। जिसके लिये कोई ठोस कारण नहीं बताया गया। शायद शासन की बुनियाद को हिला कर रख देनी वाली इस विरोध प्रदर्शन को सरकार पचा नहीं पा रही।
By: Sumit K Jha
www.nrainews.com

Friday, October 3, 2008

कैसे निपटा जाए आतंकवाद से- 01

हिन्दुस्तान में आतंकवादियों के हौसले बुलंद है। सरकारें हीलिंग टच की नीति अपना रही है तो बदले मे आतंकवादी विस्फोट कर रहे हैं। निशाने पे है देश की निर्दोष जनता। आज की तारीख़ में देश का हर कोना निशाने पर आया और दिल को थर्राने वाले हादसे हुए है। ये सब कारनामे जेहाद रुपी इस्लामी आतंकवादियों का हैं। ये जहां-तहां देश के कोने-कोने में अपनी कार्यवाही को अंजाम दे रहे हैं और हमारी सरकारें मूकदर्शक बन कर खड़ी हुई है। आतंकवाद के मूल मे इस्लामी चरमपंथ है जो विश्व के अन्य हिस्सों में भी काल का दूसरा नाम बन गया है।



सरकार राजनीतिक सत्यता के चक्कर में आतंकवादियों के प्रति हमदर्दी का रुख़ अपनाकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही हैं। हाल के दिनों में दो घटना मुस्लिम तुष्टिकरण की तरफ ध्यान आकर्षित करती है, जो की आतंकवाद का मूल कारण हैं। पहला अमरनाथ संघर्ष में तिरंगा का अपमान। श्रीनगर में यों जलाया गया था तिरंगा....
क्या यह संसार के किसी देश में सम्भव था.....???

इस राष्ट्रीय अपमान का क्या करेंगे.........???

क्या इसे देश के खिलाफ युद्ध नहीं माना जाये..............???

दूसरी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कुलपति मुशीरुल हसन, शिक्षक और छात्र खुलकर आतंकवादियों की कानूनी और वैचारिक समर्थन में आगे आ गए। मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह हसन के उस बयान का समर्थन किया जिसमें उन्होंने जामिया के छात्रों को कानूनी मदद देने का ऐलान किया था। दरअसल कांग्रेस पार्टी आतंकवाद से कड़ाई से निपटने के नाम पर मुस्लिम वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहती।
हम आतंकवाद से निपटने में नाकाम रहे हैं। कई सरकारें आईं और गईं। लेकिन आतंकवाद रोज़ सुरसा की तरह मुंह फैलाए जा रहा है. आतंकवाद के मूल मे इस्लामी चरमपंथ है जो विश्व के अन्य हिस्सों में भी काल का दूसरा नाम बन गया है।
कैसे निपटा जाए इस आतंकवाद से, यह सवाल अहम है. उससे भी ज़्यादा अहम है आतंकवाद का मूल क्या है? क्यों दुनिया के कुछ देशों में चल रहे विवादों को अन्य देश भुगत रहे हैं? क्या ये सभ्यताओं का संघर्ष है? क्या हम राजनीतिक सत्यता के चक्कर में आतंकवादियों के प्रति हमदर्दी का रुख़ अपनाकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं? आख़िर कैसे निपटा जाए इस इस्लामी आतंकवाद से?

.......जारी।

Thursday, October 2, 2008

जेहाद या आतंकवाद का फसाद

जेहादी आतंक का भूमंडलीकरण हो चुका है। सारी दुनिया को कट्टरपंथी इस्लामी आस्था के लिए मजबूर करने वाले जेहादी युद्ध विश्वव्यापी है और इससे संपूर्ण मानवता आतंकित है। दक्षिण पूर्व में आस्ट्रेलिया इससे पीड़ित है। फिलीपींस, थाईलैंड इसके प्रभाव क्षेत्र हैं। रूस, मिस्त्र, युगोस्लाविया, स्पेन पीड़ित है। हलाँकि अमेरिका और ब्रिटन खुलकर आतंकवाद के खिलाफ मैदान में है। यहाँ तक की अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने जेहादी आतंकवाद को 'इस्लामी फासीवाद' कहा था।

अगर बात हिन्दुस्तान की करे तो हिन्दुस्तान जेहाद के नाम पर बढ़ रहे आतंकवाद के निशाने पे है। हम जिहाद नामी इस्लामी आतंकवाद से पिछले दो दशक से लड रहे है। जिन दिनों हिन्दुस्तान इस्लामी आतंकवाद से लड रहा था उन दिनों अमेरिका सहित पश्चिमी विश्व के लोग भारत में कश्मीर केन्द्रित आतंकवाद को स्वतंत्रता की लडाई मान कर हाथ पर हाथ धरे बैठे थे। और हमने भी कभी अपने देश में चल रहे आतंकवाद को परिभाषित कर उससे लड्ने की कोई रणनीति अपनाई??? शायद कभी नहीं? इसके पीछे दो कारण हैं। एक तो हमने कभी आतंकवाद की इतना भयावह रूप की कल्पना नहीं की थी, दूसरा भारत में आतंकवाद के लिये सदैव पडोसी देश को दोषी ठहरा कर हमारे नेता अपने दायित्व से बचते रहे और तो और आतंकवाद के इस्लामी पक्ष की सदैव अवहेलना की गयी और मुस्लिम वोटबैंक के डर से इसे चर्चा में ही नहीं आने दिया गया।

हिन्दुस्तानियों ने जिहाद प्रेरित इस इस्लामी आतंकवाद से लड्ने के तीन अवसर गँवाये हैं। (१) 1989 में इस्लाम के नाम पर पकिस्तान के सहयोग से कश्मीर घाटी में हिन्दुओं को भगा दिया गया तो भी इस समस्या के पीछे छुपी इस्लामी मानसिकता को नहीं देखा गया। और कश्मीरी हिन्दुओं को उनको हाल पर छोर दिया गया। (२) 1993 में, जब जिहाद प्रेरित इस्लामी आतंकवाद कश्मीर की सीमाओं से बाहर मुम्बई पहुँचा। इस अवसर पर भी इस घटना को बाबरी ढाँचे को गिराने की प्रतिक्रिया मानकर चलना बडी भूल थी और यही वह भूल है जिसका फल आज भारत भोग रहा है। (३) 13 दिसम्बर 2001, जब संसद पर आक्रमण के बाद भी पाकिस्तान के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गयी। यह अंतिम अवसर था जब भारत में देशी मुसलमानों को आतंकवाद की ओर प्रवृत्त होने से रोका जा सकता था। इस समय तक भारत में आतंकवाद का स्रोत पाकिस्तान के इस्लामी संगठन और खुफिया एजेंसी हुआ करते थे और भारत के मुसलमान केवल सीमा पार से आने वाले आतंकवादियों को सहायता उपलब्ध कराते थे। इसके बाद जितने भी आतंकवादी आक्रमण भारत पर हुए उसमें भारत के जिहादी संगठन लिप्त हैं। और इन सबसे भी भयावह तो अभी के हालात् में राजनीतिक दलों और जामिया जैसे शिक्षण संस्थान का आतंकवाद का खुला समर्थन है। शिक्षा के क्षेत्र से जेहादी वायरस को दूर करना होगा।

जेहाद अपने को नये रंग में ढालने की कोशिश कर रहा है। उसका यह तेवर कितना ख़तरनाक, उसकी धार कितनी तीखी तथा जहर बुझी है, उसका अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुछ दिनों पहले पाकिस्तान की लाल मस्जिद में जुटी सैकड़ों महिलाओं ने अपने बच्चों को जेहादी बनाने की शपथ ली थी। महिलाओं की इस सभा को मस्जिद के मौलाना अजीज की बेटी ने संबोधित किया था। यह सही है कि हिन्दुस्तान जैसे कई देशों की इस्लामिक संस्थाएं, शिक्षण-संस्थान और उलेमा तथा विद्वान यह प्रचार कर रहे हैं कि आतंकवादी जिस जेहाद शब्द के इस्तेमाल के साथ निर्दोष लोगों का कत्ल कर रहे हैं, इस्लाम में उसको पूरी तरह ख़ारिज किया गया है। इन संस्थाओं ने इस मुत्तलिक बाकायदा मुहिम संचालित कर रखी है।

वक़्त आ गया है की, आतंकवाद के खिलाफ सारे देशो को एक मंच पर आना होगा, और इस जेहाद रुपी भाष्मासूरी विचारधारा से निजात पाया जाये। वर्ना यह सिलसिला एक अटूट श्रृंखला बनता जाएगा और हर ओसामा-बिन लादेन के पीछे आतंकी कमान संभालने के लिए उसका बेटा हमजा-बिन लादेन के रूप में तैयार खड़ा मिलेगा।

वक़्त आ गया है की जनता अपने राजनितिक आका से सवाल करे की सिमी उनके लिए मायने रखती है या जनता की सुरक्षा??

वक़्त आ गया है की जामिया जैसे संस्थान से पूछे की, क्या हक़ बनता है जनता के पैसे से आतंकवादियों की कानूनी मदद करने का???

वक़्त आ गया है अर्जुन सिंह, लालू परसाद यादव, राम विलास पासवान, मुलायम सिंह, अमर सिंह जैसे छदम धर्मनिरपेक्ष नेताओं को देशभक्ति की पाठ याद दिलाने का????

क्योकि अभी नहीं तो फिर कभी नहीं !!!

 

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