* लोकतंत्र के महापर्व में वाक्-चलीसा * आखिर क्यों फ़ेंका जरनैल सिंह ने जूता ? * लोकतंत्र का महापर्व और "कुछ ख्वाहिश" * "कश्मीरी पंडित" होने का दर्द * राजनेताओं हो जाओ सावधान, जाग रहा हैं हिंदुस्तान * जागो! क्योंकि देश मौत की नींद सो रहा हैं। * आखिर यह तांडव कब तक? * पाकिस्तानियों में अमेरिकी नीति का खौफ * खामोशी से क्रिकेट को अलविदा कह गया दादा * कैसे निपटा जाए आतंकवाद से- 01 * कैसे निपटा जाए आतंकवाद से- 02 * कैसे निपटा जाए आतंकवाद से- 03 * कैसे निपटा जाए आतंकवाद से- 04 * क्या इसे आतंकवाद न माना जाये ? * कही कश्मीर नहीं बन जाये "असम" * जेहाद या आतंकवाद का फसाद * बेबस हिन्दुस्तान, जनता परेशान, बेखबर हुक्मरान * ‘आतंकवाद की नर्सरी’ बनता आजमगढ़ * आतंकवाद का नया रूप * आतंकवाद और राजनीति *
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Saturday, November 29, 2008

आखिर यह तांडव कब तक ?

देश की वित्तीय राजधानी मुबंई में आखिरकार आतंक का नंगा नाच जंबाज सिपाहियों के बलिदान के बुते समाप्त हो गया। लेकिन कोलाबा के लियोपोल्ड रेस्तराँ से शुरू हुआ आतंक का यह नंगा नाच अपने पीछे कई ज्वलंत सवाल छोड़ गया हैं। सबसे बड़ा सवाल आखिर यह तांडव कब तक ? आज देश अपने हुक्ममरानों से पूछता हैं आखिर आतंकवाद के बेदी पर और कितने बलिदान देगा हिंदुस्तान ? कितने हेमंत करकरे,मेजर संदीप उन्नीकृष्णन और गजेंद्र सिंह को पूरे राजकीय सम्मान के साथ भावभीनी श्रद्धांजलि दी जायेगी ? आखिर क्यों 9/11 के बाद अमरीका में और 7/7 के बाद ब्रिटेन में कोई बडा आतंकवादी हमला नहीं हुआ ? क्या सही मायने में हम आतंकवाद के खिलाफ लडाई में हार रहे हैं ? अगर हाँ, तो जिम्मेदारी किसकी ?

आतंकवादी हमेशा एक नये तरीके से अपने कारनामों को अंजाम दे रहा हैं। लेकिन तमाम वादों,कसमों और दावों के बावजूद परिणाम वहीं ढाक के तीन पात आ रहे हैं। अगर पिछ्ले कुछ आतंकवादी हमलों का विश्लेषण किया जाये, तो एक खास पैटर्न का इस्तेमाल देखने को मिलता था। लेकिन मुबंई में उसे नहीं अपनाया गया। इतना ज्यादा गोला-बारुद हमले के वक्त़ एक बार में होटल के अंदर ले जाना नामुमकिन था। तो क्या इसे पहले से होटल के अंदर जमा किया जा रहा था ? अगर हाँ, तो क्या इसे खुफ़िया तंत्र और होटल प्रशासन की लापरवही मानी जाये ? आतंकी जिस तरह से पुलिस की गाड़ी लेकर मुबंई की सड़कों पर भागे, उससे लगता था कि वे मुबंई की सड़कों से अनजान नहीं थे। तो क्या सचमुच आतंकी विदेशी थे ? या फ़िर इनके साथ कुछ स्थानीय नुमांईदे भी थे ? या ये विदेशी आतंकी पहले से मुबंई मे डेरा जमा रखे थे ? यहाँ फिर खुफ़िया तंत्र की नकामी नज़र आ रही हैं।

हमेशा की तरह प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने इस हमले में विदेशी हाथ होने का दावा किया हैं। माननीय प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के पास इसके समर्थन में क्या सबुत हैं ? और अगर सबुत हैं,तो आखिर कितने बलिदानों का इंतजार हैं माननीय प्रधानमंत्री और गृहमंत्रीजी को ? मेरे पहुँचने से डर कर भाग गये आतंकी। क्या यह बयान किसी भी मुल्क के गृहमंत्री उन हालातों के बीच दे सकता हैं ? पाटिल साब अगर सचमुच आपके डर से आतंकी भाग खड़े हुये, तो कामा अस्पताल के साथ-साथ आपको ताज होटल, ओबेरॉय होटल और नरीमन हाउस भी जाना चाहिये था। अगर आप ऐसा करते तो शायद जान-माल की इतनी क्षति नहीं उठानी पड़ती।

पाटिल साब, इतनी मांगों के बावज़ूद आखिर क्यों एक आतंकवाद निरोधक केंद्रीय एजेंसी नहीं बनायी जा रहीं ? आखिर क्यों आतंकवाद के खिलाफ़ लड़ाई को भी राज्यों के भरोसे छोर दिया गया हैं ?

अब जनता हिसाब मांगना शुरू कर चुकी हैं, और अब हुक्ममरानों को जबाब देने के लिये तैयार हो जाना चाहिये। देश के नागरिकों की जान की कीमत चंद सिक्कों में नहीं तोली जा सकती। और न हमारी मौत का फ़ैसला सीमापार बैठे कुछ कायर कर सकते हैं। भारत के सरजमीं पर आये हर सैलानी यहाँ के मेहमान हैं, कसम उन जानों की यह तांडव और नहीं।


अब यह अवाम पूछता हैं हुक्ममरानों से आखिर यह तांडव कब तक ?

Sumit K Jha(सुमीत के झा)
www.nrainews.com

Wednesday, October 22, 2008

क्या इसे आतंकवाद न माना जाये ?

आतंकवाद का अर्थ होता है सुविचारित एवं विधिवत रूप से आतंक (भय) फैलाने वाली कार्यवाही करके अपनी बात को मनवाने के लिये दबाव बनाना। तो जो कुछ महाराष्ट्र में हो रहा है, क्या इसे आतंकवाद न कहा जाये।


कुछ राजनितिक रूप से असफल लोगो ने यह फैसला करना शुरू कर दिया, की 'भैयाओं'(महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के लिए इस्तमाल होने वाला संज्ञा) को रेलवे परीक्षा नहीं देनी दी जायेगी, और इसके लिए उम्मीदवारों की रेलवे स्टेशनों और परीक्षा केन्द्रों पर सरेआम पिटाई की गयी। कभी हिन्दू धर्म की सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाने वाली शिवसेना और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ताओं ने इन छात्रों को मुंबई की सड़को पे बेरहमी से पिटाई की, और पुलिस मूकदर्शक बन कर देखती रही।


क्या यह आतंकवाद नहीं ? राज की "राज"निति का शिकार उन मासूम छात्रों को बनना पड़ा, जो बकायादा परीक्षा के द्वारा नौकरी की तलाश में स्वप्ननगरी आए थे। न तो इन्हें राज की राजनीति से कोई वास्ता था, और न रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव की राजनीति से। "भैया लोग" महाराष्ट्र रोटी की तलाश में आए थे, न की "मराठी मानुष" की रोटी छीनने। इन्हें बचपन से बताया गया था देश में कहीं भी आने-जाने, रहने का इन्हें संवैधानिक अधिकार है। इन्हें यह पता नहीं था की आज इस देश के अन्दर छोटे छोटे कई देश बन चुके है,जहाँ के अपने कानून है, जहाँ के अपने शाषक हैं।


मुंबई में आजीविका की तलाश में आने वाले व्यक्ति की पिटाई करवाने वाले राज ठाकरे के दादाजी यानि कि बाल ठाकरे के पिता "प्रबोधनकर ठाकरे" खुद रोजी-रोटी की तलाश में मध्यप्रदेश से महाराष्ट्र आए थे। और यह दावा कोई और नहीं बल्कि पुणे विश्वविद्यालय की महात्मा फुले पीठ के चेयरमैन और आम्बेडकर के बारे में गहरे जानकार "प्रोफेसर हरि नार्के" ने राकांपा के मुखपत्र 'राष्ट्रवादी' में प्रकाशित अपने लेख में किया था। नार्के ने इस लेख में मनसे प्रमुख राज ठाकरे द्वारा उत्तर भारतीयों के खिलाफ जारी हमलों की कड़ी आलोचना की थी। उन्होंने कहा था मनसे प्रमुख राज ठाकरे को अपने दादा यानी कि बाल ठाकरे के पिता प्रबोधनकर ठाकरे की आत्मकथा पढ़नी चाहिए। प्रबोधनकर ने अपनी आत्मकथा में लिखा था कि उन्होंने मध्यप्रदेश में अपनी पढ़ाई की और फिर वे आजीविका के लिए कई राज्यों में घूमे।


मुंबई को अपनी बपौती समझने वाला ठाकरे परिवार खुद मुंबई का मूल निवासी नहीं हैं। यहाँ सवाल यह उठता कि जो लोग खुद दो पीढ़ियों पहले रोजी-रोटी की तलाश में मुंबई आए उन्हें मुंबई में काम की तलाश में आने वालों की पिटाई का हक किसने दिया?


शिवसेना और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना देश में आतंकवाद फैला रही हैं। सुविचारित एवं विधिवत रूप से आतंक फैलाने वाली कार्यवाही से अपनी बात को मनवाने के लिये दबाव बनाया जा रहा हैं। और आतंकवाद इसी को कहते हैं। यह आतंकवाद का नया रूप है जिसे "क्षेञवाद का आतंकवाद" कहना गलत नहीं होगा।

सुमित के झा(sumit k jha)
http://www.nrainews.com/

Friday, October 3, 2008

कैसे निपटा जाए आतंकवाद से- 01

हिन्दुस्तान में आतंकवादियों के हौसले बुलंद है। सरकारें हीलिंग टच की नीति अपना रही है तो बदले मे आतंकवादी विस्फोट कर रहे हैं। निशाने पे है देश की निर्दोष जनता। आज की तारीख़ में देश का हर कोना निशाने पर आया और दिल को थर्राने वाले हादसे हुए है। ये सब कारनामे जेहाद रुपी इस्लामी आतंकवादियों का हैं। ये जहां-तहां देश के कोने-कोने में अपनी कार्यवाही को अंजाम दे रहे हैं और हमारी सरकारें मूकदर्शक बन कर खड़ी हुई है। आतंकवाद के मूल मे इस्लामी चरमपंथ है जो विश्व के अन्य हिस्सों में भी काल का दूसरा नाम बन गया है।



सरकार राजनीतिक सत्यता के चक्कर में आतंकवादियों के प्रति हमदर्दी का रुख़ अपनाकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रही हैं। हाल के दिनों में दो घटना मुस्लिम तुष्टिकरण की तरफ ध्यान आकर्षित करती है, जो की आतंकवाद का मूल कारण हैं। पहला अमरनाथ संघर्ष में तिरंगा का अपमान। श्रीनगर में यों जलाया गया था तिरंगा....
क्या यह संसार के किसी देश में सम्भव था.....???

इस राष्ट्रीय अपमान का क्या करेंगे.........???

क्या इसे देश के खिलाफ युद्ध नहीं माना जाये..............???

दूसरी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कुलपति मुशीरुल हसन, शिक्षक और छात्र खुलकर आतंकवादियों की कानूनी और वैचारिक समर्थन में आगे आ गए। मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह हसन के उस बयान का समर्थन किया जिसमें उन्होंने जामिया के छात्रों को कानूनी मदद देने का ऐलान किया था। दरअसल कांग्रेस पार्टी आतंकवाद से कड़ाई से निपटने के नाम पर मुस्लिम वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहती।
हम आतंकवाद से निपटने में नाकाम रहे हैं। कई सरकारें आईं और गईं। लेकिन आतंकवाद रोज़ सुरसा की तरह मुंह फैलाए जा रहा है. आतंकवाद के मूल मे इस्लामी चरमपंथ है जो विश्व के अन्य हिस्सों में भी काल का दूसरा नाम बन गया है।
कैसे निपटा जाए इस आतंकवाद से, यह सवाल अहम है. उससे भी ज़्यादा अहम है आतंकवाद का मूल क्या है? क्यों दुनिया के कुछ देशों में चल रहे विवादों को अन्य देश भुगत रहे हैं? क्या ये सभ्यताओं का संघर्ष है? क्या हम राजनीतिक सत्यता के चक्कर में आतंकवादियों के प्रति हमदर्दी का रुख़ अपनाकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं? आख़िर कैसे निपटा जाए इस इस्लामी आतंकवाद से?

.......जारी।

Thursday, October 2, 2008

जेहाद या आतंकवाद का फसाद

जेहादी आतंक का भूमंडलीकरण हो चुका है। सारी दुनिया को कट्टरपंथी इस्लामी आस्था के लिए मजबूर करने वाले जेहादी युद्ध विश्वव्यापी है और इससे संपूर्ण मानवता आतंकित है। दक्षिण पूर्व में आस्ट्रेलिया इससे पीड़ित है। फिलीपींस, थाईलैंड इसके प्रभाव क्षेत्र हैं। रूस, मिस्त्र, युगोस्लाविया, स्पेन पीड़ित है। हलाँकि अमेरिका और ब्रिटन खुलकर आतंकवाद के खिलाफ मैदान में है। यहाँ तक की अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने जेहादी आतंकवाद को 'इस्लामी फासीवाद' कहा था।

अगर बात हिन्दुस्तान की करे तो हिन्दुस्तान जेहाद के नाम पर बढ़ रहे आतंकवाद के निशाने पे है। हम जिहाद नामी इस्लामी आतंकवाद से पिछले दो दशक से लड रहे है। जिन दिनों हिन्दुस्तान इस्लामी आतंकवाद से लड रहा था उन दिनों अमेरिका सहित पश्चिमी विश्व के लोग भारत में कश्मीर केन्द्रित आतंकवाद को स्वतंत्रता की लडाई मान कर हाथ पर हाथ धरे बैठे थे। और हमने भी कभी अपने देश में चल रहे आतंकवाद को परिभाषित कर उससे लड्ने की कोई रणनीति अपनाई??? शायद कभी नहीं? इसके पीछे दो कारण हैं। एक तो हमने कभी आतंकवाद की इतना भयावह रूप की कल्पना नहीं की थी, दूसरा भारत में आतंकवाद के लिये सदैव पडोसी देश को दोषी ठहरा कर हमारे नेता अपने दायित्व से बचते रहे और तो और आतंकवाद के इस्लामी पक्ष की सदैव अवहेलना की गयी और मुस्लिम वोटबैंक के डर से इसे चर्चा में ही नहीं आने दिया गया।

हिन्दुस्तानियों ने जिहाद प्रेरित इस इस्लामी आतंकवाद से लड्ने के तीन अवसर गँवाये हैं। (१) 1989 में इस्लाम के नाम पर पकिस्तान के सहयोग से कश्मीर घाटी में हिन्दुओं को भगा दिया गया तो भी इस समस्या के पीछे छुपी इस्लामी मानसिकता को नहीं देखा गया। और कश्मीरी हिन्दुओं को उनको हाल पर छोर दिया गया। (२) 1993 में, जब जिहाद प्रेरित इस्लामी आतंकवाद कश्मीर की सीमाओं से बाहर मुम्बई पहुँचा। इस अवसर पर भी इस घटना को बाबरी ढाँचे को गिराने की प्रतिक्रिया मानकर चलना बडी भूल थी और यही वह भूल है जिसका फल आज भारत भोग रहा है। (३) 13 दिसम्बर 2001, जब संसद पर आक्रमण के बाद भी पाकिस्तान के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गयी। यह अंतिम अवसर था जब भारत में देशी मुसलमानों को आतंकवाद की ओर प्रवृत्त होने से रोका जा सकता था। इस समय तक भारत में आतंकवाद का स्रोत पाकिस्तान के इस्लामी संगठन और खुफिया एजेंसी हुआ करते थे और भारत के मुसलमान केवल सीमा पार से आने वाले आतंकवादियों को सहायता उपलब्ध कराते थे। इसके बाद जितने भी आतंकवादी आक्रमण भारत पर हुए उसमें भारत के जिहादी संगठन लिप्त हैं। और इन सबसे भी भयावह तो अभी के हालात् में राजनीतिक दलों और जामिया जैसे शिक्षण संस्थान का आतंकवाद का खुला समर्थन है। शिक्षा के क्षेत्र से जेहादी वायरस को दूर करना होगा।

जेहाद अपने को नये रंग में ढालने की कोशिश कर रहा है। उसका यह तेवर कितना ख़तरनाक, उसकी धार कितनी तीखी तथा जहर बुझी है, उसका अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुछ दिनों पहले पाकिस्तान की लाल मस्जिद में जुटी सैकड़ों महिलाओं ने अपने बच्चों को जेहादी बनाने की शपथ ली थी। महिलाओं की इस सभा को मस्जिद के मौलाना अजीज की बेटी ने संबोधित किया था। यह सही है कि हिन्दुस्तान जैसे कई देशों की इस्लामिक संस्थाएं, शिक्षण-संस्थान और उलेमा तथा विद्वान यह प्रचार कर रहे हैं कि आतंकवादी जिस जेहाद शब्द के इस्तेमाल के साथ निर्दोष लोगों का कत्ल कर रहे हैं, इस्लाम में उसको पूरी तरह ख़ारिज किया गया है। इन संस्थाओं ने इस मुत्तलिक बाकायदा मुहिम संचालित कर रखी है।

वक़्त आ गया है की, आतंकवाद के खिलाफ सारे देशो को एक मंच पर आना होगा, और इस जेहाद रुपी भाष्मासूरी विचारधारा से निजात पाया जाये। वर्ना यह सिलसिला एक अटूट श्रृंखला बनता जाएगा और हर ओसामा-बिन लादेन के पीछे आतंकी कमान संभालने के लिए उसका बेटा हमजा-बिन लादेन के रूप में तैयार खड़ा मिलेगा।

वक़्त आ गया है की जनता अपने राजनितिक आका से सवाल करे की सिमी उनके लिए मायने रखती है या जनता की सुरक्षा??

वक़्त आ गया है की जामिया जैसे संस्थान से पूछे की, क्या हक़ बनता है जनता के पैसे से आतंकवादियों की कानूनी मदद करने का???

वक़्त आ गया है अर्जुन सिंह, लालू परसाद यादव, राम विलास पासवान, मुलायम सिंह, अमर सिंह जैसे छदम धर्मनिरपेक्ष नेताओं को देशभक्ति की पाठ याद दिलाने का????

क्योकि अभी नहीं तो फिर कभी नहीं !!!

Saturday, September 27, 2008

बेबस हिन्दुस्तान, जनता परेशान, बेखबर हुक्मरान

9/11 के बाद अमरीका में और 7/7 के बाद ब्रिटेन में कोई बडा आतंकवादी हमला नहीं हुआ। लेकिन राजनीतिक रुप से विफल इस देश में लगातार कई बम धमाके हुए हैं।

सही मायने में हम हिन्दुस्तानी आतंकवाद के खिलाफ लडाई में हार चुके हैं। हाल के दिनों में भारत में लगातार कई बम धमाके हुए हैं। हर घटना के बाद वादे किये जाते हैं, आतंकवाद पर काबू पाने की कसमे खाए जाती हैं। कथित मानवाधिकारवादी पुलिस का मनोबल तोड़कर आतंकवादियों का हौसला बढ़ा रहे हैं। हालाकिं कभी भी मानवाधिकारवादी आतंकवादी गतिविधियों का निंदा नहीं करते।

एक नज़र हाल के कुछ बड़े धमाकों पे-

# 27 सितम्बर 2008- देश की राजधानी दिल्ली के महरौली इलाके में एक बम विस्फोट, इस धमाके में चार लोगों के मरने की खबर है तथा कम से कम 17 लोग घायल हुए हैं।

# 13 सितंबर 2008 - दिल्ली के तीन बाज़ारों में सिलसिलेवार बम धमाके। 24 लोगों की मौत, सैकड़ों घायल। इंडियन मुजाहिदीन ने ज़िम्मेदारी ली.

# 26 जुलाई 2008 - गुजरात का अहमदाबाद शहर सिलसिलेवार धमाकों से दहला। कम से कम 16 धमाकों में 45 लोगों की जानें गईं.

# 25 जुलाई 2008 - भारत की आईटी सिटी बंगलौर में आठ धमाके, कम तीव्रता वाले इन धमाकों में एक महिला की मौत हुई जबकि घायलों की संख्या लगभग 15 थी।

# 13 मई 2008 - गुलाबी नगरी जयपुर दहली श्रृंखलाबद्ध बम विस्फोटों से। भीड़भाड़ वाले इलाकों में सात धमाकों में कम से कम 63 लोगों को जान गंवानी पड़ी।

# 25 अगस्त 2007 - हैदरबाद में आतंकवादी हमले के लिए भीड़ भाड़ वाले इलाकों को चुना गया । इसमें 40 लोग मरे.

# 18 मई 2007 - जुमे की नमाज के वक्त हैदराबाद की ऐतिहासिक मस्जिद में धमाका। 11 लोगों की मौत। इसके बाद धमाकों के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान उग्र भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस फायरिंग में पांच की मौत.

# 19 फरवरी 2007 - भारत से पाकिस्तान जाने वाली समझौता एक्सप्रेस ट्रेन में दो बम धमाके, 66 लोगों की मौत जिनमें ज्यादातर पाकिस्तानी थे।

# 8 सितंबर 2006 - महाराष्ट्र के मालेगांव में एक मस्जिद के पास सिलसिलेवार धमाके हुए जिनमें कम से कम 32 लोग मारे गए।


# 11 जुलाई 2006 - मुंबई में ट्रेन में सिलसिलेवार सात धमाके हुए। 180 से ज्यादा लोग मारे गए।

# 7 मार्च 2006 - वाराणसी के प्रसिद्ध हनुमान मंदिर में तीन धमाके हुए। कम से कम 15 लोग मारे गए और 60 घायल हुए।

# 29 अक्टूबर 2005 - दिल्ली के सरोजिनी नगर बाज़ार में तीन धमाके। 66 लोगों की मौत।

# 15 अगस्त 2004 - असम में एक बम धमाका। 16 लोग मारे गए और दर्जनों घायल हुए। मरने वालों में ज्यादातर स्कूली बच्चे थे।

# 25 अगस्त 2003 - मुंबई में झावेरी बाजार सहित दो जगहों पर कार बम विस्फोट। 60 लोगों की मौत।

# 13 मार्च 2003 - मुंबई की लोकल ट्रेन में धमाका, 13 लोगों की मौत।


जेहादी आतंकवाद का जाल पूरे देश में फैल गया है तथा इस पर काबू पाने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे। पुलिस को अब सेना जैसे विशेष अधिकार मिलने चाहिए ताकि वह बिना राजनीतिक दबावों के आतंकवाद को कुचल सके।

(सभी डाटा के लिए गूगल का आभार)

Tuesday, September 23, 2008

‘आतंकवाद की नर्सरी’ बनता आजमगढ़

सांकृत्यायन और कैफी का आजमगढ़ अब 'आतंकवाद की नर्सरी’ बनता जा रहा है। एक जमाने में इस्लामी शिक्षा के लिए विश्व प्रसिद्ध आजमगढ़ आज आतंकवाद की काली साया में डरा सहमा अपने पहचान बनाये रखने के लिए तड़प रहा हैं। गुलाम भारत को आजाद कराने के लिए वर्ष 1857 की क्रान्ति में आजमगढ़ के वीर शहीदों वीर कुंवर सिंह, गोगा साव, भीखा साव और आजमशाह जैसे सेनानियों ने तिरंगा हाथों में थामा और इसे ऊँचा रखने के लिए जान की बाजी लगा दी। और आज उसी आजमगढ़ की मिंट्टी ने ऐसे कपुतो को पैदा किया की, सिमी के खतरनाक आतंकवादी अबु बशर और दिल्ली विस्फोटों में शामिल साजिद और आतिफ के नाम से बदनाम हो गया है आजमगढ़।


देश के तमाम हिस्सों में हुए बम धमाकों के तार ऐसे आजमगढ़ से जुड़े कि अब तो समूचे जनपद को शर्मशार होना पड़ रहा है। जनपद के सरायमीर थाना क्षेत्र का संजरपुर कस्बा सर्वाधिक चर्चा में है, क्योंकि मारे गए आतंकवादी इसी गांव के है। 45 लाख की आबादी वाले आजमगढ़ जिले में चन्द मुट्ठीभर लोगों के हावी होने से अब आजमगढ को आतंक का गढ़ कहा जाने लगा है। चन्द मुट्ठीभर लोगों ने लगभग 45 लाख की मिश्रित आबादी- हिन्दू, मुसलमान, सिख और ईसाइयों को इस कदर बदनाम किया कि हर कोई आज इन घटनाओं से शर्मशार है।

आजमगढ़ की गंगा जमुना संस्कृति कही खो सी गयी हैं। सांकृत्यायन, कैफी आजमी ,शिक्षाविद अल्लामा शिब्ली नोमानी, पंडित अयोध्याय सिंह उपाध्याय (हरिऔध) को भुला कर, आज यहां भटक गयी युवा पीढ़ी ने दाउद इब्राहिम, अबू सलेम, हाजी मस्तान और अब मुफ्ती अबू बशीर को अपना आदर्श बना लिया है जिससे इस जिले को आतंकवादियों की जननी कहा जाने लगा है।

आज उप्र के पूर्वांचल में स्थित जनपद आजमगढ़ आतंकवादी हमलों से आहत पूरे देश की निगाह में मुजरिम साबित हो रही हैं।

एक नजर आजमगढ़ की काली इतिहास पे-
* 1993 में मुम्बई बम धमाकों का आरोपी बना आजमगढ़ के सरायमीर निवासी अबु सलेम, जो अभी भी कारागार में बन्द है।
*आजमगढ़ के मुबारकपुर थाना क्षेत्र के बम्हौर गांव के बने देशी तमन्चे से ‘कैसेट किंग’ गुलशन कुमार की हत्या।
*अयोध्या में मारे गए आतंकी इमरान का फर्जी पासपोर्ट आजमगढ़ से बना मिलना।
*वाराणसी में गिरफ्तार पाक आतंकी वलीउल्लाह का डीएल भी आजमगढ़ में बना हुआ।
*वर्ष 2000 में पाकिस्तान का एक आतंकवादी शहर से पकड़ा गया।
*वर्ष 2007 में वाराणसी कचहरी में हुए बम धमाके का आरोपी हकीम तारिक कासमी गिरफ्तार किया गया।
*14 अगस्त 2008 को आजमगढ़ के सरायमीर थाना क्षेत्र के बीनापारा से मुफ्ती अबुल बसर की गिरफ्तार हुई, जिसपर अहमदाबाद बम धमाकों का मास्टरमाइन्ड होने का आरोप है।

Monday, September 22, 2008

आतंकवाद का नया रूप

आतंकवाद की समस्या अब न केवल व्यापक रूप धारण कर रही है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसमें आतंकवादियों के शामिल होने, अत्याधुनिक हथियारों, पेशेवर प्रशिक्षण तथा नेटवर्किंग के प्रयोग के साथ ही इसने नया रूप भी ले लिया है।

इस बीच दिल्ली पुलिस ने रविवार तड़के जामिया नगर इलाके से इण्डियन मुजाहिदीन के तीन संदिग्ध आतंककारियों जिया-उर-रहमान, मोहम्मद शकील और शाकिर निसार को गिरफ्तार किया। जिया-उर-रहमान के पिता और एल-18 फ्लैट की देखरेख करने वाले अब्दुल रहमान को भी गिरफ्तार किया गया है। पुलिस ने बाटला हाउस के संरक्षक अब्दुल रहमान को आतंककारी नहीं माना है। उसका आरोप है कि अब्दुल ने जामिया नगर के बाटला हाउस में आतंककारियों के लिए फ्लैट की व्यवस्था की थी, जिसमें पांच आतंककारी पिछले दो माह से रह रहे थे।


जिया-उर-रहमान जामिया मिलिया इस्लामिया में बी.ए. तृतीय वर्ष का छात्र है। वह विस्फोट के लिए उपयुक्त स्थलों की सूचनाएं एकत्र करता था। शकील जामिया मिलिया में ही एम.ए. (अर्थशास्त्र) द्वितीय वर्ष का छात्र है। जबकि शाकिर निसार सिक्किम मणिपाल विश्वविद्यालय से दूरस्थ शिक्षा के जरिए एमबीए कर रहा है। शुक्रवार को पुलिस मुठभेड़ में मारा गया आतिफ उर्फ बशीर कम्प्यूटर व अन्य तकनीकी कामों में माहिर था। उसने संचार प्रौद्योगिकी में बी.एससी. कर रखी थी। गिरफ्तार आतंककारियों के मुताबिक वही दिल्ली धमाकों का मास्टरमाइण्ड था। उनके मुताबिक वह धमाकों की पूरी योजना बनाता था।

हर धमाके के बाद यह लोग टीवी पर खबर सुनते हुए जश्न मनाते थे। जिसके रखे बम से ज्यादा लोग मारे जाते थे उसे विशेष बधाई दी जाती थी।इन लोगों के पास एक हिन्दी पत्रिका का अंक था, जिसके मुख पृष्ठ पर धमाकों में घायल एक बच्चे की तस्वीर के साथ शीर्षक लगा था "बेचारा और बेबस भारत"।इस तस्वीर और शीर्षक से यह उपहास उड़ाते हुए आनन्द लेते थे।

यह सारे वाकये इस बात की गबाही देती है, की आतंकवाद अब एक नशा बन चुकी है, जिसके गिरफ्त में पढ़े लिखे युवा पिड्डी अपनी मर्ज़ी से सामिल हो रही है। आतंकवाद लोकतंत्र, मानवता और एक सभ्य समाज के अस्तित्व के लिए खतरा बनता जा रहा है। आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए उत्तरदायी एजेंसियाँ को अपनी जिम्मेदारियों का निष्ठापूर्वक और कानून के दायरे से बाहर जाकर निर्वाह करना होगा। इन आतंकवादियों से उनकी ही जुबान में बात करने का समय आ गया है।

समय आ गया है की हम इन वतन्परस्तो को यह बता सके की इन बम धमाके में कोई हिन्दुस्तानी मरा नहीं है। वतन पे मिटने वालो को शहीद कहते है, शहीद कभी मरते नहीं......अमर होते है ।

समय आ गया है की हम इन्हें यह बता दे, की हिन्दुस्तान बेचारा और बेबस नहीं हैं।

Sunday, July 27, 2008

आतंकवाद और राजनीति

26 जुलाई 2008, स्थान- गुजरात का अहमदाबाद शहर. 17 श्रृंखलाबद्ध बम विस्फोटों में कम से कम अठारह व्यक्तियों की मौत, और 100 लोग घायल.

25 जुलाई 2008, स्थान- सूचना प्रौद्योगिक शहर बेंगलुरु. एक घंटे के भीतर हुए आठ विस्फोटों से एक महिला की मौत हो गई थी, जबकि सात लोग घायल हो गए.

आने वाली सुबह पता नही किसके घर के चिराग अपने साथ बुझा ले जायेगी??



अहमदाबाद धमाकों के सुराग माननीय केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल जी के पास हैं, लेकिन देशहित में वे इसे सार्वजनिक नहीं करेंगे. कोई उनसे पुछे आखिर किस देशहित की बात वह कर रहे हैं????



जिस लगन और मेहनत से हमारे राजनीतक आका सरकार गिराने और बचाने की कवायद करते हैं, काश उसकी आधी मेहनत भी देश की सुरक्षा के लिए किया होता. तो आतंकवाद का यह नंगा नाच न होता. आतंकी लगातार अपने मंसूबों में कामयाब न होते.




राजनीतिक रुप से विफल इस देश का सफल नागरिक आतंकवाद की वेदी पे अपनी बली दे रहा हैं. दुनिया को लोकतंत्र का पाठ पढाने वाला यह देश, आज अपने नागरिको को सुरक्षा नही दे पा रहा. हर बार विशेष जाँच दल बनता है, जाँच चलती है, न्यायालय में केस चलता है और धीरे धीरे फिर भूल जाते हैं.



सोचिए, 9/11 के बाद अमरीका में और 7/7 के बाद ब्रिटेन में कोई बडा आतंकवादी हमला नहीं हुआ. यहाँ तक कि स्पेन जैसे देश में मेड्रिड धमाकों के बाद कोई हमला नहीं हुआ. हालत यह होने लगी है कि अब आतंकवादी हमले बाढ, चक्रवात और सुखे जैसी प्राकृतिक आपदाओं जैसे लगने लगे हैं.



हम भारतीय आतंकवाद के खिलाफ लडाई में हार रहे हैं.दूनिया के समक्ष देश की छवि एक कमजोर राष्ट्र की बन रही है. देश के निति निर्धारकों मे ईच्छाशक्ति की कमी है. हम हद से अधिक उदासीन और सहिष्णु हो गए हैं.




हमारा देश सचमुच में एक कमजोर देश हैं. हमारा देश राजनीतिक रुप से एक विफल देश साबित हो रहा हैं, और हम इस देश के सफल नागरिक.

 

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