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Monday, November 24, 2008

पाकिस्तानियों में अमेरिकी नीति का खौफ

'न्यूयार्क टाइम्स' में एक रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद पाकिस्तानी अवाम में मुल्क के टुकड़े-टुकड़े होने का खौफ समा गया हैं। 'न्यूयार्क टाइम्स' की रविवार को प्रकाशित 'ए रिड्रोन मैप ऑफ साउथ एशिया' नामक रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तानी रणनीतिकारों और अवाम में भारत और अफगानिस्तान के बीच बन रहे रणनीतिक संबंध से खलबली मच गई है। रिपोर्ट के अनुसार, ज्यादातर पाकिस्तानी मानते हैं कि अमेरिका पाकिस्तान को मजबूत करने की बजाए इस इस्लामी मुल्क के टुकड़े-टुकड़े करने में अपनी सहभागिता दे रहा हैं। रिपोर्ट में पाकिस्तान सेना के जनरल (सेवानिवृत्त) तलत मसूद के हवाले से कहा गया है कि पाकिस्तानी अवाम अफगानिस्तान में भारत की मौजूदगी को शक की निगाह से देख रहा हैं। जनरल (सेवानिवृत्त) तलत मसूद ने कहा कि पाकिस्तानी हुक्ममरान भारत की अफगानिस्तान में मौजूदगी से खफा हैं। और इसे रोकने के लिये अमेरिकी दख़ल चाहता हैं। लेकिन अमेरिकी सरकार इसे रोकने के लिए कुछ नहीं कर रही है।

पाकिस्तानी सेना के कुछ अधिकारी का मानना हैं कि पाकिस्तान में कबायली इलाकों में हो रहे अमेरिकी हमले आग में घी का काम कर रहे हैं। आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में केवल अमेरिका को फायदा हो रहा है और पाकिस्तान का तो महज इस्तेमाल किया जा रहा है। यह बात पाकिस्तानी अवाम में घर करती जा रही हैं।

भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते को भी पाकिस्तान में शक की निगाह से देखा जा रहा हैं। पाकिस्तानी सेना कुछ अधिकारियों के हवाले से कहा गया हैं कि परमाणु समझौते से साबित होता है कि भारत और अमेरिका के बीच सैन्य रिश्ते तेजी से मजबूत होते जा रहे हैं। अफगानिस्तान में भारी भारतीय निवेश को लेकर भी पाकिस्तान में खलबली मच गई है। गौरतलब है कि भारत ने अफगानिस्तान की सेना को प्रशिक्षण देने की पेशकश की थी। साथ ही साथ भारत ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में अफगानी संसद भवन के निर्माण के लिए 950 करोड़ रुपए की भारी-भरकम रकम देने का भी एलान किया था।

अमेरिका में नये बनते राजनीतिक समीकरण के बीच पाकिस्तानी अवाम की ये शिकायत कितनी सुनी जाती हैं, यह देखना मजेदार होगा।

Sumit K Jha
www.nrainews.com
http://truth-define.blogspot.com

Wednesday, November 5, 2008

ओबामा बने अमेरिका के 44वें राष्‍ट्रपति

21 महीनों से जारी मैराथन के बाद डेमोक्रेटिक उम्मीदवार बराक ओबामा अमेरिका के 44वें राष्‍ट्रपति चुन लिए गए हैं। अभी तक प्राप्त नतीजे के अनुशार डेमोक्रेटिक उम्मीदवार बराक ओबामा को 367 वोट और मैक्केन के पक्ष में 168 वोट आए हैं। अमेरिका में जादुई आंकड़ा 270 इलेक्टोरल कॉलेज का होता हैं। सर्वेक्षणों की मानें तो बराक ओबामा शुरूआती दौर से ही जॉन मैक्केन पर पांच से 11 फीसदी की बढ़त बनाए हुए थे।

कई मायने में यह राष्ट्रपति चुनाव ऐतिहासिक रहा।अमेरिका के इतिहास में पहली बार कोई अश्वेत को राष्ट्रपति बनने का गौरव प्राप्त हुआ है। दो अमेरिकी अंतरिक्षयात्रियों ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपना मतदान अंतरिक्ष में किया। पिछले 40 साल में सबसे अधिक मतदान इस साल हुआ। चुनाव में लगभग तीन करोड़ वोटरों ने मतदान किया। एक अनुमान के मुताबिक प्रचार अभियान के दौरान तकरीबन दो अरब डॉलर (लगभग 100 अरब रुपए) का खर्च उम्मीदवारों ने किया था।

इस बीच शिकागो में अमेरिकी जनता से रुबुरु हुए बराक ओबामा। ओबामा ने अमेरिकी जनता को शुक्रिया कहा, और देश को आर्थिक संकट से निकालने का वादा किया।

By: सुमीत के झा (sumit k jha)
www.nrainews.com

Saturday, October 4, 2008

कैसे निपटा जाए आतंकवाद से- 03

कैसे निपटा जाए आतंकवाद से- 02

# तात्कालिक उपाय : धमाकों से सहमकर आम जनता पर बंदिशें लगाने के बजाय भारत सरकार को अमेरिका और इसराइल की तर्ज पर seek and destroy (ढूँढो और मारो) की नीति अपनाते हुए इन आतंक फैलाने वालों का सफाया कर उनमें पलटवार का ऐसा डर बैठाना चाहिए क‍ि कोई भी आतंकवादी या आतंकी संगठन भारत और उसके नागरिकों को नुकसान पहुँचाने से पहले सौ बार सोचे। अंतरराष्ट्रीय दबाव की परवाह किए बगैर भारत सरकार को इस मुद्दे पर कठोर रुख अख्तियार करना होगा।


# आतंकवाद निरोधी कानून : आतंकवाद निरोधी कानून को पुख्ता बनाना होगा। हाल ही में अलग-अलग राज्यों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों की जाँच और आगे निर्विघ्न कार्रवाई के लिए एक संघीय एजेंसी बनाई जाए। सुरक्षा बलों को आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में विशेष अधिकार दिए जाएँ। वर्तमान कानून इस समस्या से निपटने में प्रभावी नहीं है। आतंकवाद पर काबू पाने के लिए आतंकवादियों अथवा आतंकवादी संगठनों के समर्थको व शुभचिंतको पर भी कठोर कार्यवाई की जाना चाहिए। भारत में कानून बड़े पुराने हैं और अब प्रासंगिक भी नहीं रहे। आतंकवाद निरोधक कानूनों की समय-समय पर समीक्षा हो, जिससे जरूरत पड़ने पर आवश्यक बदलाव या फेरबदल संभव हो।


# दीर्घकालीन उपाय : भारत के संविधान ने सभी धर्मों को अपने धर्म के प्रचार, प्रसार व शिक्षा की स्वतंत्रता दी है, पर कई बार इसकी आड़ में बच्चों में बचपन से ही अलगाववाद की भावना भर दी जाती है। मुस्लिम मदरसे हों, सिख स्कूल हों, मिशनरी हों या हिन्दू पाठशाला, सभी के पाठ्यक्रम में एकरूपता लाई जाना चाहिए। कई बार बच्चों में दूसरे धर्मों के प्रति गलत व बुरी धारणाएँ बन जाती हैं, पाठ्य पुस्तकों के माध्यम से बच्चे के दिमाग में फैली भ्रांतियाँ दूर की जा सकती हैं।

# राजनीति : केन्द्र और राज्य सरकारों को भी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देश की सुरक्षा के बारे में सोचना होगा। सोचिए, 9/11 के बाद अमरीका में और 7/7 के बाद ब्रिटेन में कोई बडा आतंकवादी हमला नहीं हुआ। यहाँ तक कि स्पेन जैसे देश में मेड्रिड धमाकों के बाद कोई हमला नहीं हुआ। दूनिया के समक्ष देश की छवि एक कमजोर राष्ट्र की बन रही है। देश के निति निर्धारकों मे ईच्छाशक्ति की जो कमी है, उस से पार पाना होगा। वोट बैंक की चिंता किये बिना आतंकवाद से लरना होगा। क्योंकि नेता हो या आम आदमी सबका वजूद इस देश से है, इसकी सुरक्षा सर्वोपरि है।

# छदम धर्मनिरपेक्ष और मानवधिकार संघठन से पार पाना : छदम धर्मनिरपेक्ष और मानवधिकार संघठन से पार पाना होगा। इन संघठानो का सिर्फ एक काम बाकी रह गया है, पुलिस की मनोबल को तोड़ना। आज तक किसी आतंकवादी हमले की बाद इनका कोई बयान नहीं आया, लेकिन पुलिस कार्रवाई की बाद कोर्ट जाना, मोमबती लेकर मार्च करना इनका सगल बन गया हैं। आतंकवादी संगठनों के इन समर्थको व शुभचिंतको पर भी कठोर कार्यवाई की जाना चाहिए। इन व्यक्ति अथवा संस्थाओं पर वित्तीय प्रतिबंध लगाए जाना चाहिए।

......जारी।
 

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