* लोकतंत्र के महापर्व में वाक्-चलीसा * आखिर क्यों फ़ेंका जरनैल सिंह ने जूता ? * लोकतंत्र का महापर्व और "कुछ ख्वाहिश" * "कश्मीरी पंडित" होने का दर्द * राजनेताओं हो जाओ सावधान, जाग रहा हैं हिंदुस्तान * जागो! क्योंकि देश मौत की नींद सो रहा हैं। * आखिर यह तांडव कब तक? * पाकिस्तानियों में अमेरिकी नीति का खौफ * खामोशी से क्रिकेट को अलविदा कह गया दादा * कैसे निपटा जाए आतंकवाद से- 01 * कैसे निपटा जाए आतंकवाद से- 02 * कैसे निपटा जाए आतंकवाद से- 03 * कैसे निपटा जाए आतंकवाद से- 04 * क्या इसे आतंकवाद न माना जाये ? * कही कश्मीर नहीं बन जाये "असम" * जेहाद या आतंकवाद का फसाद * बेबस हिन्दुस्तान, जनता परेशान, बेखबर हुक्मरान * ‘आतंकवाद की नर्सरी’ बनता आजमगढ़ * आतंकवाद का नया रूप * आतंकवाद और राजनीति *
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Wednesday, April 8, 2009

लोकतंत्र का महापर्व और "कुछ ख्वाहिश"

भारतीय लोकतंत्र के महापर्व की तैयारियाँ चरमकाष्टा पर पहुँच चुकी हैं। साम, दाम, दंड, भेद………… हर हथकंडा अपनाया जा रहा हैं। सत्ता सुख से कोई महरुम नहीं होना चाहता हैं। वादे किये जा रहे हैं। आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति खुब परवान चढ रही हैं। कोई हाथ काटने पर तुला हैं तो कोई सीने पर रोलर चलवाने पर। लेकिन इन सब के बीच आम आदमी की अवाज कही सुनने को नहीं मिल रहा। एक आम आदमी को क्या चाहिये, इस बात पर कोई भी राजनीतिक पार्टी ध्यान नहीं दे रही।

भारतीय राजनीति में अब सिर्फ़ वहीं खिलाड़ी टिक सकता हैं, जिसके पास अकूत पैसा हो। जिसके पास किसी खास वर्ग का वोट बैंक हो। इस वैश्विक वित्तीय संकट में राजनीति अपना प्रभाव
बढाकर पैसे कमाने का साधन बन गया हैं। खैर यह तो थी कुछ सत्य, जिससे हर कोई वाकिफ़ हैं। अब बात करते हैं, राजनीति से मुझे क्या चाहिये ? और यह मांग लगभग हर युवा हिंदुस्तानी का हैं।

(1) एक सरकार जो देश की गरीब, पीड़ित, संघर्षरत जनता का प्रतिनिधित्व करे।
(2) नेताओं के उम्र सीमा तय करे।
(3) तुष्टीकरण की नीति बंद करे।

4) युवा शक्ति को राजनीति में अहम किरदार प्रदान करे।
(5) सांप्रदायिकता और जातिवाद की राजनीति बंद करे।
(6) आपराधिक छवि के नेताओं के लिये लोकतंत्र के मंदिर के दरवाजे बंद करे।
(7) दलबदलू नेताओं को राजनीति से बाहर करे।
(8) आतंकवाद के खिलाफ़ सख्त कारवाई करे।

(9) विकलांगो के कल्याण के लिए योजना बनाये।
(10) हर बच्चा स्कूल जायें। शिक्षा की जिम्मेवारी सरकार की हों।
(11) क्षेत्रीय पार्टियों को केंद्र की राजनीति से दुर रखे।
(12) चुनावी काम में लगे सरकारी कर्मचारियों के लिये वोट डालने की समुचित इंतजामात किया जाये।
(13) वोट डालने को अधिकार नहीं, जिम्मेवारी घोषित किया जाये।
(14) आरक्षण की नीति को सिर्फ़ प्राइमरी लेवल तक रखा जाये। आरक्षण माली हलात पर हो, न की जात या धर्म के नाम पर्।
(15) काले धन पर सख्त कानून लाये।



ये "कुछ ख्वाहिश" हैं, जोकि भारतीय लोकतंत्र को एक गतिशील लोकतंत्र बना सकता हैं। अगर आप इनमे से किसी बात से सहमत ने हो, तो कमेंट के जरिये अपनी बात रखे।

Saturday, October 4, 2008

कैसे निपटा जाए आतंकवाद से- 03

कैसे निपटा जाए आतंकवाद से- 02

# तात्कालिक उपाय : धमाकों से सहमकर आम जनता पर बंदिशें लगाने के बजाय भारत सरकार को अमेरिका और इसराइल की तर्ज पर seek and destroy (ढूँढो और मारो) की नीति अपनाते हुए इन आतंक फैलाने वालों का सफाया कर उनमें पलटवार का ऐसा डर बैठाना चाहिए क‍ि कोई भी आतंकवादी या आतंकी संगठन भारत और उसके नागरिकों को नुकसान पहुँचाने से पहले सौ बार सोचे। अंतरराष्ट्रीय दबाव की परवाह किए बगैर भारत सरकार को इस मुद्दे पर कठोर रुख अख्तियार करना होगा।


# आतंकवाद निरोधी कानून : आतंकवाद निरोधी कानून को पुख्ता बनाना होगा। हाल ही में अलग-अलग राज्यों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों की जाँच और आगे निर्विघ्न कार्रवाई के लिए एक संघीय एजेंसी बनाई जाए। सुरक्षा बलों को आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में विशेष अधिकार दिए जाएँ। वर्तमान कानून इस समस्या से निपटने में प्रभावी नहीं है। आतंकवाद पर काबू पाने के लिए आतंकवादियों अथवा आतंकवादी संगठनों के समर्थको व शुभचिंतको पर भी कठोर कार्यवाई की जाना चाहिए। भारत में कानून बड़े पुराने हैं और अब प्रासंगिक भी नहीं रहे। आतंकवाद निरोधक कानूनों की समय-समय पर समीक्षा हो, जिससे जरूरत पड़ने पर आवश्यक बदलाव या फेरबदल संभव हो।


# दीर्घकालीन उपाय : भारत के संविधान ने सभी धर्मों को अपने धर्म के प्रचार, प्रसार व शिक्षा की स्वतंत्रता दी है, पर कई बार इसकी आड़ में बच्चों में बचपन से ही अलगाववाद की भावना भर दी जाती है। मुस्लिम मदरसे हों, सिख स्कूल हों, मिशनरी हों या हिन्दू पाठशाला, सभी के पाठ्यक्रम में एकरूपता लाई जाना चाहिए। कई बार बच्चों में दूसरे धर्मों के प्रति गलत व बुरी धारणाएँ बन जाती हैं, पाठ्य पुस्तकों के माध्यम से बच्चे के दिमाग में फैली भ्रांतियाँ दूर की जा सकती हैं।

# राजनीति : केन्द्र और राज्य सरकारों को भी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देश की सुरक्षा के बारे में सोचना होगा। सोचिए, 9/11 के बाद अमरीका में और 7/7 के बाद ब्रिटेन में कोई बडा आतंकवादी हमला नहीं हुआ। यहाँ तक कि स्पेन जैसे देश में मेड्रिड धमाकों के बाद कोई हमला नहीं हुआ। दूनिया के समक्ष देश की छवि एक कमजोर राष्ट्र की बन रही है। देश के निति निर्धारकों मे ईच्छाशक्ति की जो कमी है, उस से पार पाना होगा। वोट बैंक की चिंता किये बिना आतंकवाद से लरना होगा। क्योंकि नेता हो या आम आदमी सबका वजूद इस देश से है, इसकी सुरक्षा सर्वोपरि है।

# छदम धर्मनिरपेक्ष और मानवधिकार संघठन से पार पाना : छदम धर्मनिरपेक्ष और मानवधिकार संघठन से पार पाना होगा। इन संघठानो का सिर्फ एक काम बाकी रह गया है, पुलिस की मनोबल को तोड़ना। आज तक किसी आतंकवादी हमले की बाद इनका कोई बयान नहीं आया, लेकिन पुलिस कार्रवाई की बाद कोर्ट जाना, मोमबती लेकर मार्च करना इनका सगल बन गया हैं। आतंकवादी संगठनों के इन समर्थको व शुभचिंतको पर भी कठोर कार्यवाई की जाना चाहिए। इन व्यक्ति अथवा संस्थाओं पर वित्तीय प्रतिबंध लगाए जाना चाहिए।

......जारी।
 

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