Wednesday, December 3, 2008
राजनेताओं हो जाओ सावधान, जाग रहा हैं हिंदुस्तान
यह देश की जनता की स्वत:स्फूर्त भावना थी। यह आयोजन प्रायोजित नहीं था, एसएमएस, मेल, रेडियो स्टेशनों, टीवी चैनलों से लोगों को आतंकवाद के खिलाफ इस प्रदर्शन में शामिल होने की अपील की गई थी। इस जनआंदोलन में सभी वर्ग के लोगों ने हिस्सा लिया। जिनमें छात्र, स्वयंसेवी संगठन के लोग, प्रोफ़ेसर, बुद्धिजीवी, उद्यमी और बॉलीवुड के सितारे भी शामिल थे। प्रदर्शनकारियों के हाथों में तिरंगा झंडा, तख़्तियाँ और बैनर थी। ज़्यादातर प्रदर्शनकारी का मानना था कि हमारे सॉफ्ट स्टेट की पॉलिसी और राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते ही कोई भी हमारे 'घर' में घुसकर हमें मारकर चला जाता हैं।
वहीं दूसरी तरफ़ मुंबई में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे आमजनों को मुंबई पुलिस ने बलपूर्वक भगा दिया। जिसके लिये कोई ठोस कारण नहीं बताया गया। शायद शासन की बुनियाद को हिला कर रख देनी वाली इस विरोध प्रदर्शन को सरकार पचा नहीं पा रही।
By: Sumit K Jha
www.nrainews.com
Sunday, November 9, 2008
जोश से दौड़ी साढी दिल्ली
इससे पहले सुबह सात बजे केंद्रीय सचिवालय स्थित विनय मार्ग से दिल्ली के उप राज्यपाल तेजेंद्र खन्ना ने हरी झंडी दिखाकर एयरटेल दिल्ली हाफ मैराथन को रवाना किया। दिल्ली हाफ मैराथन विनय मार्ग से शुरू होकर सत्य मार्ग अफ्रीका एवेन्यु सफदरजंग फ्लाईआ॓वर, अरविन्दो मार्ग, पृथ्वीराज रोड, मानसिंह रोड, अकबर रोड, राजपथ, जनपथ से वापस होते हुए विनय मार्ग स्थित सेंट्रल सेक्रेट्रिएट ग्राउंड पहुंची। इस साल इनाम में भी इजाफा किया गया था। कुल प्राइज मनी 210,000 अमेरिकी डॉलर की थी। हाफ मैराथन जीतने वाले महिला और पुरुष ऐथलीटों को 25,000 डॉलर दिए गये। दूसरे स्थान को 15000 और तीसरे को 10000 डॉलर दिए गये।
सुमीत के झा(sumit k jha)
http://www.nrainews.com/
Saturday, November 1, 2008
कैसे निपटा जाए आतंकवाद से- 04
कैसे निपटा जाए आतंकवाद से- 02
कैसे निपटा जाए आतंकवाद से- 03
छह महीनों में 73 बम धमाके,सिर्फ़ वर्ष 2008 में 934 से ज्यादा लोगों कि बम धमाके में मौत। इराक, अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान के बाद भारतवासियों ने आतंकवाद की बेदी पर सबसे ज्यादा बली दी हैं। 9/11 के बाद अमरीका में और 7/7 के बाद ब्रिटेन में कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ। लकिन भारत में तो क्रम सा ही बनता जा राहा हैं। जयपुर,हैदराबाद,बंगलौर,मालेगांव,दिल्ली और अब असम। आतंकियों ने बार-बार अपने हौंसलों और भारत सरकार की नाकामी को उजागर किया।
हर बार कि तरह असम धमाके के बाद रेड अलर्ट जारी कर दिया गया। लेकिन आखिर इस रेड अलर्ट से देश की आंतरिक सुरक्षा को कितनी मदद मिली ? सरकार सिर्फ़ रेड अलर्ट जारी कर अपने कर्तव्य से फ़ारिग नही हो सकती। राजनिती ने आतंकवाद के खिलाफ़ युद्घ को सिर्फ़ कमजोर किया हैं। ये आतंकवाद के प्रति नरम रुख का ही असर है, कि बाकायदा समाचार चैनलों को सूचना देने के बाद धमाके को अंजाम दिया जा रहा हैं। बदले मे सरकार रेड अलर्ट जारी कर, बयानबाज़ी कर अपने कर्तव्यो को इतिश्री कह रही हैं। राजनीतिज्ञों ने अपने तुष्टिकरण कि निति से दों धर्मों के बीच एक नफ़रत की खाईं बना दी हैं, जिसे भरने खुद राम-रहीम को आना पड़े। नफ़रत की यही खाईं आतंकवाद को खाद मुहैया करती हैं। आतंकवाद रुपी सुरसा ने न तो मंदिरों को बख्शा है और न मस्जिदों को। मरने वाला मंदिर में आरती कर रहा हो या मस्जिद में नमाज़ कर रहा हो, आतंकवादियों पर कोई फ़र्क नही पड़ता।
शायद अब वक्त़ आ गया है कि सियासतदानों को रेड अलर्ट,चौकसी,बयानबाज़ी,मुआवजों और तुष्टिकरण की राजनीति से उपर उठकर अवाम को एक सुरक्षित माहौल मुहैया कराये। वक्त़ आ गया है, कि सियासतदान संविधान के समक्ष ली गयी अखणडता की शपथ को याद करे। देश के निति निर्धारकों में जो ईच्छाशक्ति की कमी है,उसे सुधारना होगा। हम हद से अधिक उदासीन और सहिष्णु हो गए हैं। अब इन्हें अलविदा कहने का वक्त़ आ गया हैं।
दिल से बोलु तो अब आतंकवाद पर लिखने का मन नही करता। उपर वाले से बस यहीं कामना हैं, "अब बस"।
सुमीत के झा (sumit k jha)
http://www.nrainews.com/
Sunday, October 19, 2008
दिल्ली शहर, हादसों का शहर
रूट नंबर 39 की एक ब्लूलाइन बस, ट्रक और एक कार के मलबे की चपेट में आने से बस चालक सुरेन्दर पाल की मौके पर ही मौत हो गई। बाकी मरने वालो का अभी तक पहचान नहीं हो पाया है। दिल्ली मेट्रो के इतिहास में यह पहला मौका है जब निर्माणाधीन पूरा का पूरा ढांचा सडक पर आ गिरा हो।
हलाँकि दिल्ली मेट्रो सुरक्षा के लिए तमाम जरूरी सावधानी बरतती है। ऐसे में यह घटना परियोजना को समय पर पूरा करने के लिए दिखाई जा रही हड़बड़ी के कारण हो सकती हैं। कही ऐसा तो नहीं राजधानी में वर्ष 2010 में होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों की परियोजनाओं को समय पर पूरा करने के लिए की जा रही जल्दबाजी और हड़बड़ी के कारण सुरक्षा को ताक पे रखा जा राह हो?
इस बीच दिल्ली मेट्रो रेल निगम (डीएमआरसी) के प्रोजेक्ट मैनेजर विजय आनंद ने दुर्घटना के लिए तकनीकी गडबडी को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि मामले की उच्च स्तरीय जांच की जाएगी। उनके अनुसार मेट्रो रेल का ढांचा लगाते समय इसी तरह की लांचिंग का इस्तेमाल होता आ रहा है। लेकिन इस तरह का हादसा पहली बार हुआ है, जो इस बात का संकेत दे रहा है की यह घटना तकनीकी गडबडी का परिणाम हो सकता है,जिसकी वजह से एक हिस्से में पूरे लोहे का ढांचा और इसके साथ लगे स्लैब्स नीचे गिर गए।
यह घटना रविवार के सुबह हुआ। अगर यह घटना सोमवार से शनिवार के बीच हुआ होता, तो शायद तस्वीर ही कुछ और होती। और यही बात पूर्वी दिल्ली वासियों को राहत दे रही है।
Sumit K Jha
http://www.nrainews.com/
Saturday, September 27, 2008
बेबस हिन्दुस्तान, जनता परेशान, बेखबर हुक्मरान
सही मायने में हम हिन्दुस्तानी आतंकवाद के खिलाफ लडाई में हार चुके हैं। हाल के दिनों में भारत में लगातार कई बम धमाके हुए हैं। हर घटना के बाद वादे किये जाते हैं, आतंकवाद पर काबू पाने की कसमे खाए जाती हैं। कथित मानवाधिकारवादी पुलिस का मनोबल तोड़कर आतंकवादियों का हौसला बढ़ा रहे हैं। हालाकिं कभी भी मानवाधिकारवादी आतंकवादी गतिविधियों का निंदा नहीं करते।
एक नज़र हाल के कुछ बड़े धमाकों पे-
# 27 सितम्बर 2008- देश की राजधानी दिल्ली के महरौली इलाके में एक बम विस्फोट, इस धमाके में चार लोगों के मरने की खबर है तथा कम से कम 17 लोग घायल हुए हैं।
# 13 सितंबर 2008 - दिल्ली के तीन बाज़ारों में सिलसिलेवार बम धमाके। 24 लोगों की मौत, सैकड़ों घायल। इंडियन मुजाहिदीन ने ज़िम्मेदारी ली.
# 26 जुलाई 2008 - गुजरात का अहमदाबाद शहर सिलसिलेवार धमाकों से दहला। कम से कम 16 धमाकों में 45 लोगों की जानें गईं.
# 25 जुलाई 2008 - भारत की आईटी सिटी बंगलौर में आठ धमाके, कम तीव्रता वाले इन धमाकों में एक महिला की मौत हुई जबकि घायलों की संख्या लगभग 15 थी।
# 13 मई 2008 - गुलाबी नगरी जयपुर दहली श्रृंखलाबद्ध बम विस्फोटों से। भीड़भाड़ वाले इलाकों में सात धमाकों में कम से कम 63 लोगों को जान गंवानी पड़ी।
# 25 अगस्त 2007 - हैदरबाद में आतंकवादी हमले के लिए भीड़ भाड़ वाले इलाकों को चुना गया । इसमें 40 लोग मरे.
# 18 मई 2007 - जुमे की नमाज के वक्त हैदराबाद की ऐतिहासिक मस्जिद में धमाका। 11 लोगों की मौत। इसके बाद धमाकों के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान उग्र भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस फायरिंग में पांच की मौत.
# 19 फरवरी 2007 - भारत से पाकिस्तान जाने वाली समझौता एक्सप्रेस ट्रेन में दो बम धमाके, 66 लोगों की मौत जिनमें ज्यादातर पाकिस्तानी थे।
# 8 सितंबर 2006 - महाराष्ट्र के मालेगांव में एक मस्जिद के पास सिलसिलेवार धमाके हुए जिनमें कम से कम 32 लोग मारे गए।
# 11 जुलाई 2006 - मुंबई में ट्रेन में सिलसिलेवार सात धमाके हुए। 180 से ज्यादा लोग मारे गए।
# 7 मार्च 2006 - वाराणसी के प्रसिद्ध हनुमान मंदिर में तीन धमाके हुए। कम से कम 15 लोग मारे गए और 60 घायल हुए।
# 29 अक्टूबर 2005 - दिल्ली के सरोजिनी नगर बाज़ार में तीन धमाके। 66 लोगों की मौत।
# 15 अगस्त 2004 - असम में एक बम धमाका। 16 लोग मारे गए और दर्जनों घायल हुए। मरने वालों में ज्यादातर स्कूली बच्चे थे।
# 25 अगस्त 2003 - मुंबई में झावेरी बाजार सहित दो जगहों पर कार बम विस्फोट। 60 लोगों की मौत।
# 13 मार्च 2003 - मुंबई की लोकल ट्रेन में धमाका, 13 लोगों की मौत।
जेहादी आतंकवाद का जाल पूरे देश में फैल गया है तथा इस पर काबू पाने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे। पुलिस को अब सेना जैसे विशेष अधिकार मिलने चाहिए ताकि वह बिना राजनीतिक दबावों के आतंकवाद को कुचल सके।
(सभी डाटा के लिए गूगल का आभार)
Sunday, July 27, 2008
कितने सुरक्षित है हम???
यह एक प्रश्न नही चेतावनी हैं. कुछ भी नही बदला हैं राजधानी दिल्ली में. आतंकियों का अगला निशाना बन सकती है दिल्ली.
कल शाम जब अहमदाबाद में श्रृंखलाबद्ध बम विस्फोट को अंजाम दी जा रही थी, मैं अपने एक दोस्त को छोङने नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन गया हुआ था. अहमदाबाद बम विस्फोट की सुचना मिलने के बाद मेरे अंदर की पत्रकारिता जाग गयी और मैंने स्टेशन की सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेने की ठानी. और जो मैने अपने आँखो से देखा, वह सत्यता से परे था. पुलिस के जवान समान जाचने के बदले, बाँते करनॆ मॆ मशगुल थे. और तो और कुछ जवान टिकट जाचने मे टीटी साहब को मदद कर रहे थे. उनसे कुछ दुर टैक्सी दलाल यात्रीयो को फांसने मे लगे थे.
जब इतने संवेदनशील जगह सुरक्षा व्यवस्था का यह हाल हैं, तो पुरी दिल्ली की तो बात करना ही बेकार है.
सिलसिलेवार बम धमाकों की जिम्मेदारी लेने वाले और खुद को इंडियन मुजाहिदीन बताने वाले संगठन ने इस तरह के और हमले करने की भी धमकी दी है. ये वही संगठन हैं जिसने पहले जयपुर और उत्तर प्रदेश में हुए विस्फोटों की जिम्मेदारी भी ली थी.
तो आखिर कैसे दिल्ली वासी अपने आप को सुरक्षित समझे???
